हम हमेशा ज़िन्दगी का वह वक़्त भगवान को देने की कोशिश करते हैं, जो और किसी काम का नहीं होता। जब हमारा समाज, हमारी औलाद, दोस्त और रिश्तेदार हमसे किनारा कर लेते हैं, तब हमारा ध्यान परमात्मा की भक्ति की ओर जाता है। जब हम बूढ़े हो जाते हैं और शरीर के अंग हमारा साथ छोड़ देते हैं- आँखें ठीक से देख नहीं पातीं, कान सुन नहीं पाते और शरीर के बाक़ी अंग भी साथ छोड़ देते हैं- तब हम मालिक की भक्ति करना चाहते हैं। हमें अपनी ज़िन्दगी का सबसे बेहतरीन वक़्त परमात्मा की भक्ति में लगाना चाहिए।
प्रेम की विरासत (किताब में से)


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