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आपका "आज का आगरा" ब्लॉग पर सवागत है यह ब्लॉग मेरे मम्मी-पापा को समर्पित!..."वन्दे मातरम्" .सवाई सिंह

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शुक्रवार, जून 27

हमारे बचपन का भी एक जमाना था यारो और आज ?

खुद ही स्कूल पैदल जाना होता था क्योंकि साइकिल ,बस आदि से बच्चे को स्कूल भेजने का रिवाज ही नहीं था, स्कूल भेजने के बाद कुछ अच्छा बुरा होगा ऐसा हमारे मां-बाप कभी सोचते भी नहीं थे । उस समय किसी बात का डर भी नहीं था, और पूरे गांव के लोग को ये जानते थे कि बच्चा किस का पोता या पुत्र है । खोने का डर था नहीं ।

फर्स्ट, सेकंड ,थर्ड डिवीजन पास या फेल यही हमको मालूम था । पर्सेंटेज % से हमारा कभी भी संबंध नहीं रहा ।

ट्यूशन लगाई है ऐसा बताने में भी शर्म आती थी क्योंकि हमको बुद्धि से पैदल समझा जा सकता था ।

किताबों में पीपल के पत्ते, विद्या के पत्ते, मोर पंख रखकर हम होशियार हो सकते हैं ऐसी हमारी धारणाएं थी...

कपड़े की थैली में...बस्तों में और बाद में एल्यूमीनियम की पेटियों में किताब कॉपियां बेहतरीन तरीके से जमा कर रखने में हमें महारत हासिल थी।

हर साल जब नई क्लास का बस्ता जमाते थे उसके पहले किताब कापी के ऊपर पेपर की जिल्द चढ़ाते थे और यह काम एक वार्षिक उत्सव या त्योहार की तरह होता था ।

साल खत्म होने के बाद किताबें बेचना और अगले साल की पुरानी किताबें खरीदने में हमें किसी प्रकार की शर्म नहीं होती थी.*क्योंकि तब हर साल न किताब बदलती थी और न ही पाठ्यक्रम ।

 हमारे माता पिता को ऐसा कभी लगा ही नहीं कि हमारी पढ़ाई बोझ है..

  किसी एक दोस्त को साइकिल के अगले डंडे पर और दूसरे दोस्त को पीछे कैरियर पर बिठाकर गली-गली में घूमना हमारी दिनचर्या थी ।*इस तरह हम ना जाने कितना घंटे किलोमीटर घूमे होंगे पता नहीं और किसी को परवाह भी नहीं , सिर्फ चोट लगने खून बहने पर ही मां के पास आना गाली डांट सुनना और कपड़े की पानी में भीगी पट्टी या और कोई इलाज करा कर डरते डरते फिर दोस्तों के साथ खेलने भाग जाना ।

 स्कूल में मास्टर जी के हाथ से मार खाना, पैर के अंगूठे पकड़ कर खड़े रहना, और कान लाल होने तक मरोड़े जाते वक्त हमारा आत्म सम्मान कभी आड़े नहीं आता था । सही बताएं तो आत्मसम्मान क्या होता है यह हमें और किसी को भी मालूम ही नहीं था ।

घर और स्कूल में मार खाना भी हमारे दैनिक जीवन की एक सामान्य प्रक्रिया थी ।

मारने वाला और मार खाने वाला दोनों ही खुश रहते थे...

मार खाने वाला इसलिए क्योंकि कल से आज कम पिटे हैं और मारने वाला इसलिए कि आज फिर हाथ धो लिए ।

 बिना चप्पल जूते के और किसी भी गेंद के साथ लकड़ी के कपड़े धोने वाले पट्टे से कही पर भी नंगे पैर क्रिकेट खेलने में क्या सुख था वह हमको ही पता है...

 हमने जेब खर्च कभी भी मांगा ही नहीं और पिताजी ने कभी दिया भी नहीं..

इसलिए हमारी आवश्यकता भी छोटी छोटी सी ही थीं....साल में कभी-कभार दो चार बार सेव मिक्सचर मुरमुरे का भेल, गोली टॉफी , इमली, डाँसरे, खट्टा मीठा चूर्ण खा लिया तो बहुत होता था, उसमें भी हम बहुत खुश हो जाते ।...

छोटी मोटी जरूरतें तो घर में ही कोई भी पूरी कर देता था क्योंकि परिवार संयुक्त होते थे।जैसे ताऊ ताई ,चाचा चाची काका काकी, दादा दादी , बुआ आदि ..

 दिवाली में लगी पटाखों की लड़ी को छुट्टा करके एक एक पटाखा फोड़ते रहने में हमको कभी अपमान नहीं लगा.

 अपने मां बाप को कभी बता ही नहीं पाए कि हम आपको कितना प्रेम करते हैं क्योंकि हमको आई लव यू कहना भी नहीं आता था और भाई लट्ठ डंडे का जमाना था पीटने का भी डर था ।

  स्कूल की डबल ट्रिपल सीट पर घूमने वाले हम और स्कूल के बाहर उस हाफ पेंट में रहकर गोली टाॅफी बेचने वाले की दुकान पर दोस्तों द्वारा खिलाए पिलाए जाने की कृपा हमें याद है । वह दोस्त कहां खो गए , वह बेर वाली कहां खो गई।वह चूरन बेचने वाली कहां खो गई...पता नहीं.. 

कपड़ों की सलवटें को प्रेस , आयरन , से नहीं मिटते थे बल्कि रात को सोते समय अपने तकिया या अपनी कमरके नीचे रखना ही काफी था । रिश्तों में कोई औपचारिकता नहीं थी।.

सुबह का खाना और रात का खाना इसके सिवा टिफिन में अखबार में लपेट कर रोटी ले जाने का सुख क्या है, आजकल के बच्चों को पता ही नही ...

 हमारा भी एक बचपन और लड़कपन का जमाना था जनाब ।

👉 एक बात तो तय मानिए कि जो भी पूरा पढ़ेगा उसे अपने बीते जीवन के पुराने सुहाने पल अवश्य याद आयेंगे 

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मंगलवार, अगस्त 22

राधा नाम का भरपूर आनन्द लीजिए पूज्य गुरुदेव श्री प्रेमानंद जी महाराज

जीवन अनमोल है, इसका सदुपयोग कीजिए एवं राधा नाम का भरपूर आनन्द लीजिए, तभी इस मृत्यु लोक से मुक्ति मिलेगी। क्योंकि हमारा एक मात्र चिकित्सक है परमात्मा और उसकी एक मात्र औषधि है प्रार्थना।

राधे राधे श्री हरिवंश 


"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ..."।। 

प्रत्येक प्राणी के लिए परमात्मा का हृदय अपनत्व-औदार्य एवं करूणा भाव से परिपूर्ण व कल्याणप्रद है; ऐसा मानकर अनन्याश्रित भाव से भगवदीय विधान के प्रति समर्पित रहें।

गुरुवार, जुलाई 20

अच्छी आदतें सीढ़ी की तरह जो हमारे जीवन को ऊचाईयाँ देती हैं : पूज्य संत श्री ललितप्रभ जी

राष्ट्रीय संत श्री ललित प्रभु सागर जी महाराज के दिव्य वचनों से लोगों के जीवन में आ रहे हैं परिवर्तन मैं मैं खुद गुरु महाराज जी को 2003 से फॉलो कर रहा हूं काफी कुछ जीवन में परिवर्तन आया है गुरु महाराज जी की वाणी से उनके द्वारा बताए मार्गों से... शौर्य प्रताप सिंह राजपुरोहित 

उदयपुर, 18 जुलाई राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ जी महाराज ने कहा है कि हमारी आदतें ही हमारा भविष्य तय करती हैं। कोई भी व्यक्ति अगर श्रेष्ठ जीवन का मालिक बनना चाहता है तो उसे अपने जीवन में अच्छी आदतों का मालिक बनना चाहिए। हमारा जीवन अच्छा होगा या बुरा - हमारी आदतें ही हमारा फ्यूचर तय करती है। अच्छी आदतें सीढ़ी की तरह हैं जो हमें ऊपर लेकर जाती है और बुरी आदतें भी सीढ़ी की ही भूमिका अदा करती है जो हमें ऊपर से नीचे ले आती है। जैसे होंठ फटने पर नाभि में तेल या घी की बूँद डाली जाती थी वैसे ही अच्छे जीवन का मालिक बनने के लिए अच्छी आदतों का होना जरूरी है। दुनिया में एक ही व्यक्ति है जो हमारे जीवन को बदल सकता है और वह हम खुद हैं। हर आदमी में कुछ खामियाँ होती हैं और कुछ खासियत होती हैं, खामियों को जीतना पड़ता है और खासियत को जीना होता है।

मंच पर आकर कई लोगों ने किया अपने व्यसनों का त्याग

संतप्रवर ने यहाँ टाउन हॉल मैदान में आयोजित 54 दिवसीय प्रवचनमाल में बुरी आदतों को कैसे बदलें अच्छी आदत में विषय पर प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा कि हमें अपनी आदतों के प्रति सावधान रहना चाहिए। आदत लगने में वक्त नहीं लगता पर खत्म होने में पूरी जिंदगी लग जाती है। तभी तो कहते हैं कि यह आदमी आदत से मजबूर है। अगर घर के अभिभावक बचपन से ही अच्छी आदतों का  बीजारोपण करना शुरू कर दें तो वे आदतें बड़े होने पर हमारे जीवन का संस्कार बन जाती हैं। जैसा पाणी-वैसी वाणी, जैसा आहार-वैसा व्यवहार, जैसा अन्न-वैसा मन और जैसी संगत वैसी ही- रंगत जीवन में आती है। हमें संगति के प्रति सावधान रहना चाहिए क्योंकि अच्छी संगत और अच्छी आदत हमारे जीवन को सँवार देती है।


राष्ट्र-संत ने कहा कि आदमी बीवी का गुलाम नहीं होता अपितु उससे भी ज्यादा अपनी आदतों का होता है। खुद की कमजोरियों को पहचानना इंसान की सबसे बड़ी विजय है। हम गौड न भी बन पाएँ पर गुड तो बन ही सकते हैं। संतश्री ने कहा कि हमें सबसे पहले दूसरों की कमियाँ निकालने की आदत को ठीक कर लेना चाहिए। अगर आपको एक में कभी नजर आए तो उससे बात कीजिए पर हर एक में कमी नजर आए तो खुद से बात कीजिए। उन्होंने सावधान किया कि जब भी किसी में कमी नजर आए तो ध्यान रखिए कमियाँ आप में भी है और जबान दूसरों के पास भी है। उन्होंने दूसरों की मजाक उड़ाने की आदत को भी अनुचित बताया और कहा कि अगर हम दूसरों का पानी उतारेंगे तो सामने वाला व्यक्ति हमारी आरती नहीं उतारेगा।

संतश्री ने कहा कि हमें कभी किसी की आलोचना भी नहीं करनी चाहिए। यह हमारी ऐसी गंदी आदत है जिस पर हम दूसरों की गलती पर अपनी जुबान गंदी करते हैं। हमें हमेशा दूसरों की विशेषताएँ देखनी चाहिए। हमेशा दूसरों की प्रशंसा करनी चाहिए। अच्छी किताबें पढऩे की आदत, किसी के सहयोग की आदत, भलाई की आदत, हर हाल में मुस्कुराने की आदत - ये सब वे आदतें हैं जो हमारे जीवन के स्तर को ऊचाँ उठाती हैं। उन्होंने सावधान करते हुए कहा कि हमें मोबाइल की आदत भी बहुत ज्यादा घेर रही हैं। जब तक फोन वायर से बंधा था तब तक आदमी आजाद था और जिस दिन फोन वायर से आजाद हुआ तब से आदमी फोन से बंध गया। सब टच मोबाइल में खोये हैं पर कोई किसी के टच में नहीं है। उन्होंने कहा कि मोबाइल का उपयोग करने से डिप्रेशन बढ़ जाता है, आँखे खराब हो जाती हैं, नींद की कमी हो जाती है, याददास्त कमजोर होने लगती और आँखों के नीचे निशान आने शरू हो जाते हैं।

राष्ट्र-संत ने कहा कि व्यसन मुक्ति पर विशेष जोर देते हुए कहा कि हर व्यक्ति और कोई सद्गुण अपनाए या न अपनाए पर सदा नशा मुक्त जीवन जीना चाहिए क्योंकि नशा नाश की निशानी होती है। उन्होंने कहा कि हर दिल की अब एक ही चाहत, व्यसन मुक्त हो मेरा भारत। नशा दाँत से आँत तक, दिल से दिमाग तक नुकसान करता है। शरीर में बीमारीयाँ पैदा होती हैं, भविष्य खराब होता है, परिवार टूट जाता है। व्यक्ति को गुटखा, तम्बाकू, शराब जैसे बुरी आदतों जैसे बचना चाहिए क्योंकि ये तन, मन, धन तीनों को नुकसान पहुँचाती है। संतप्रवर की प्रेरक वचनों से प्रभावित होकर लोगों ने मंच पर आकर कई लोगों ने व्यसनों का त्याग किया। जब एक महिला से संत पूछा कि आज आपके पति नशे का त्याग कर रहे हैं तब आपको ज्यादा खुशी मिल रही है या ये आपको पाँच लाख का हीरे का हार लाकर दे तो ज्यादा खुशी होगी। महिला के जवाब पर पूरे पांडाल में तालियों कि गडग़ड़ाहट हो गई जब उन्होंने कहा कि आज में बेहद खुश हूँ, मुझे कोई हीरों का हार नहीं चाहिए। मेरे पति ने व्यसनों का त्याग करके आज जीवन की बाजी जीत ली है।

समारोह का सफल संचालन संयोजक हँसराज चौधरी ने किया। समिति के अध्यक्ष राज लोढ़ा के अनुसार बुधवार को सुबह 8.45 बजे संत चन्द्रप्रभ जी महाराज आलस्य को जड़ से मिटाने का तरीका विषय पर विशेष प्रवचन देंगे।

आप गुरुजी के फेसबुक पेज से जुड़ सकते हैं और गुरु जी के अनमोल विचार का आप हर दिन आनंद ले सकते हैं

फेसबुक लिंक  https://www.facebook.com/shrilalitprabh

पूज्य संत श्री ललित प्रभु महाराज जी

बुधवार, जुलाई 19

भगवान अर्थात परमात्मा एक जलती दीप की रौशनी के समान हैं.

जो केवल अंतरात्मा से देखा जा सकता है, बाहरी नजरों से देखना यू आसान नहीं हैं। वैसे अगर हम अभी तक जीवित भी है तो सिर्फ वो सिर्फ उनकी कृपा से, और भगवान का अकाउंट अर्थात् लेखा जोखा किसी एक जन्म का नहीं होता उनके पास तो जन्म जन्मांतर का होता हैं।

नीचे के हिसाब किताब गड़बड़ हो सकते है परंतु उनके यहां का नहीं। ये दुनिया आस्था और विश्वास पर टिकीं है। हमारी आस्था और विश्वास भी है एक दिन जरूर सब ठीक हो जाएगा। ऊपर वाले पर भरोसा रखो।



गुरुवार, नवंबर 24

बढ़ती उम्र में इन्हें छोड़ दीजिए।

बढ़ती उम्र में इन्हें छोड़ दीजिए।

एक दो बार समझाने से यदि कोई नही समझ रहा है तो सामने वाले को समझाना,

     छोड़ दीजिए 

बच्चे बड़े होने पर वो ख़ुद के निर्णय लेने लगे तो उनके पीछे लगना,

     छोड़ दीजिए।

गिने चुने लोगों से अपने विचार मिलते हैं, यदि एक दो से नहीं मिलते तो उन्हें,

     छोड़ दीजिए।

एक उम्र के बाद कोई आपको न पूछे या कोई पीठ पीछे आपके बारे में गलत कह रहा है तो दिल पर लेना,

     छोड़ दीजिए।

अपने हाथ कुछ नहीं, ये अनुभव आने पर भविष्य की चिंता करना,

     छोड़ दीजिए।

यदि इच्छा और क्षमता में बहुत फर्क पड़ रहा है तो खुद से अपेक्षा करना,

     छोड़ दीजिए। 

हर किसी का पद, कद, मद, सब अलग है इसलिए तुलना करना,

     छोड़ दीजिए।

बढ़ती उम्र में जीवन का आनंद लीजिए, रोज जमा खर्च की चिंता करना,

     छोड़ दीजिए।

उम्मीदें होंगी तो सदमे भी बहुत होंगे, यदि सुकून से रहना है तो उम्मीदें करना,

     छोड दीजिए। 

मैसेज अच्छा लगे तो ठीक, न लगे तो फारवर्ड करने का विचार,                  छोड़ दीजिए।  



शनिवार, मार्च 27

आध्यात्मिक गुरु ओशो के प्रेरणादायक अनमोल वचन

आध्यात्मिक गुरु ओशो के प्रेरणादायक कुछ अनमोल वचन
Anmol vachan

"जिंदगी एक बार मिलती है तो उसका पूरा आनंद क्यों नहीं ले निराशा से बाहर है और जिंदगी के हर एक पल को खुशी से मिटाएं जिंदगी के हर एक दिन को ऐसे जियो जैसे को आज आखिरी दिन हो हर एक पल को ऐसे जियो जैसे वह आपका आखिरी पल हो।"

"यदि आप सच्चाई को देखना चाहते हो तो उसके लिए या उसके खिलाफ कोई राय ना रखें।"


"जिंदगी को कोई मुसीबत नहीं बल्कि यह एक खूबसूरत तोहफा है उसे अच्छे से जियो"

 "जब तक आदमी सृजन की कला नहीं जानता तब तक वह अस्तित्व का अंश नहीं बनता।"

"हम जो हैं वही हम सोच पाते हैं हम अपने ढंग से सोचते हैं।" 





गुरुवार, अक्टूबर 8

चुनौतिया ही जिंदगी को रोमांचक बनाती है !

जीवन में कभी कभी हादस से भी हमें बहुत कुछ सीखा जाते हैं जैसा नीचे दिए गए चित्र में हम सब देख सकते हैं कितना शानदार संदेश दिया है हम अगर अपनी बुनियादो से जुड़े रहेंगे तो हमें कोई नहीं मिटा सकता अपने इरादे और संघर्ष करते रहें फिर देखें बदलाव.....

 आज का अनमोल विचार

चुनौतिया ही जिंदगी को रोमांचक बनाती है,
और इसीसे आपके ज़िन्दगी का 
महत्त्व निर्माण होता है !!




 

मंगलवार, सितंबर 1

चार बातों में कभी भी शर्म औऱ संकोच नहीं मेहसूस करना चाहियें

 चार बातों में कभी भी शरम औऱ संकोच नहीं मेहसूस करना चाहियें 

1-पूराने कपड़े

 2-गरीब मित्र

 3-बुज़ुर्ग माता-पिता

 औऱ

 4-सरल जीवन-शैली..🙏




रविवार, अगस्त 16

ऐसे में ज़िंदगी बस घुटन भरी हो जाती है और रिश्ता होकर भी नाम का रहता है।

 


 

यही होता है जब रिश्ते में हम होते हैं। रिश्ते में एक ही इंसान कदर, समझ और प्यार का साथ देता है और त्याग करता रहता है मगर दूसरे इंसान को फीलिङ्ग्स की कोई कदर नहीं होती है। दूसरा इंसान फीलिङ्ग्स की परवाह नहीं करता है और अपने  खराब नेचर और व्यवहार के कारण दिल को दर्द और अकेलापन देता है। फिर एक तरफा रिश्ता निभाना , झुकना, सम्झौता करना  सुकून नहीं देता है। ऐसे में ज़िंदगी बस घुटन भरी हो जाती है और रिश्ता होकर भी नाम का रहता है।
यहां लोग अपनी गलती नहीं मानते किसी को अपना कैसे मानेंगे

बुधवार, जुलाई 8

Munh per kuch aur Peeth Piche kuch aur Aise Logon se Savdhan Rhe

मुँह पर कुछ और पीठ पीछे कुछ और कहने वालों से मीटर नहीं किलोमीटरों का सोशियल डिस्टेंस रखिए, 
ऐसे लोग कोरोना के भी बाप हैं .
👏😊👏
 आज का अनमोल विचार 


🙏🙏

मंगलवार, जून 30

आपके पास सही शब्द नहीं हैं तो सिर्फ मुस्कुरा दीजिये.

Kabhi kabhi life me Ham Aise fas Jaate Hai Ki hamare pass Shabd hi nahi hote Aakhir Ham Bole kya to sirf aap Muskura dijiye Ek Chhoti Se smile bahut kam a Jaati Hai
मस्त रहिए, मुस्कुराते रहिए तथा सुबह की चाय और बड़ो की राय समय-समय पर लेते रहना चाहिए 
 कोरोना के दौर में अपना और अपनों का ख्याल रखिये,
घर पर रहे, सुरक्षित रहे। ✍ सुगना फाउण्डेशन परिवार 

सोमवार, जून 29

स्वस्थ होना हमारे लिए सबसे बड़ा उपहार हैं

सफलता पाने के लिए स्वस्थ शरीर का होना बहुत ज़रूरी है। ज़िन्दगी में अगर आप कितना पैसा भी कमा ले पर आपने अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया तो सफलता के कोई मायने नहीं रह जायेगे...।

"स्वस्थ होना हमारे लिए सबसे बड़ा उपहार हैं"।

खुशियां चाहे जिसके साथ बांट लो लेकिन

 आज हम जिस मतलबी दुनिया में रहते हैं उस को ध्यान में रखते हुए हमें खुशियां तो बेशक औरों के साथ बांट लो लेकिन गम सिर्फ भरोसेमंद के
साथ ही बांटने चाहिए ।
मस्त रहिए, मुस्कुराते रहिए तथा सुबह की चाय और बड़ो की राय समय-समय पर लेते रहना चाहिए 
 कोरोना के दौर में अपना और अपनों का ख्याल रखिये,
घर पर रहे, सुरक्षित रहे। ✍ सुगना फाउण्डेशन परिवा

रविवार, जून 28

Anmol Vichar everyday

 आज अनमोल विचार की एक सुपर पोस्ट कर रहा हूं जिसने बहुत सारे अनमोल विचारों को प्रस्तुत करने की कोशिश की है यह सब कुछ आप शेयर कर सकते हैं अपने नाम के साथ

अच्छे और सच्चे रिश्ते न तो खरीदे जा सकते हैं, न उधार लिए जा सकते हैं.. 
इसलिए उन लोगों को जरुर महत्व दें, जो आपको महत्व देते हैं..
.मेहनत लगती सपनो को सच बनाने में, हौसला लगता है बुलन्दियों को पाने में, बरसो लगते है जिन्दगी बनाने में,और जिन्दगी फिर भी कम पडती है रिश्ते निभाने में।🌴🌴




















































🏃‍♂🏃‍♂
मस्त रहिए, मुस्कुराते रहिए तथा सुबह की चाय और बड़ो की राय समय-समय पर लेते रहना चाहिए 
 कोरोना के दौर में अपना और अपनों का ख्याल रखिये,
घर पर रहे, सुरक्षित रहे। ✍ 

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