सवागत है

आपका "आज का आगरा" ब्लॉग पर सवागत है यह ब्लॉग मेरे मम्मी-पापा को समर्पित!..."वन्दे मातरम्" .सवाई सिंह

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शनिवार, सितंबर 5

असली ताकत ऊँची आवाज़, रौब या दिखावे में नहीं, बल्कि..

 कभी-कभी इंसान को जरूरत से ज्यादा महत्व और तारीफ मिलने लगे तो वह अपनी असली हैसियत भूलकर खुद को दूसरों से बड़ा समझने लगता है। यही कारण है कि हर किसी को खुश करने और हर बात पर महत्व देने से पहले यह समझना जरूरी है कि सम्मान उसी का सुंदर लगता है, जो उसे पाकर भी विनम्र बना रहे। ध्यान और प्रशंसा किसी की योग्यता का प्रमाण नहीं, बल्कि कभी-कभी सिर्फ लोगों की उदारता होती है। 

इसलिए जीवन में न तो अपनी तारीफ सुनकर घमंड करना चाहिए और न ही किसी को इतना सिर पर चढ़ाना चाहिए कि वह दूसरों को छोटा समझने लगे। असली ताकत ऊँची आवाज़, रौब या दिखावे में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, संयम और विनम्रता में होती है। जो लोग खुद को साबित करने के लिए शोर नहीं मचाते, उनका खामोश आत्मविश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनता है।
दिखावे की चमक कुछ पल की होती है, मगर भीतर का सच्चा सामर्थ्य उम्र भर हर मुश्किल से लड़ना सिखाता है।
इसलिए हुंकार भरने से ज्यादा जरूरी है अपने संकल्प को इतना मजबूत करना कि वक्त खुद आपके सामने झुक जाए।

शुक्रवार, सितंबर 4

कर्म और धर्म इस लोक के साथ परलोक में भी साथ रहेगा

 पैसा घर तक साथ रहेगा और परिवार स्मशान तक,
जबकी कर्म और धर्म इस लोक के साथ परलोक में भी साथ रहेगा !!

इस संसार में धन, पद और रिश्ते यहीं छूट जाते हैं, लेकिन मनुष्य के अच्छे कर्म और उसका सच्चा धर्म (कर्तव्य, सदाचार और मानवीय मूल्य) ही ऐसी पूँजी हैं जो इस लोक के साथ-साथ परलोक में भी उसकी यात्रा के संबल बनते हैं। मनुष्यों को इसका पालन करना चाहिए 
गुरुदेव का आशिर्वाद लेते MLA राजपुरोहित 

​गीता में भी कहा गया है कि आत्मा अजर-अमर है, और शरीर के नाश होने के बाद भी उसके द्वारा किए गए कर्मों का संस्कार और फल उसके साथ आगे जाता है। 
​"यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥"
​जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों और धर्म का पालन करते हुए निष्काम भाव से सत्कर्म करता है, उसका यह लोक तो सुधरता ही है, परलोक भी श्रेष्ठ हो जाता है। अच्छे कर्म ही वो प्रकाश हैं जो अंधकारमय मार्ग में राह दिखाते हैं।

 

गुरुवार, सितंबर 3

वक्त पर भरोसा रखिए, क्योंकि...


समय के फैसले कभी गलत नहीं होते,
बस साबित होने में समय लगता है।

हर परेशानी एक सीख है और हर इंतज़ार का एक बेहतरीन परिणाम होता है। धैर्य रखें, सब सही होगा। 


शनिवार, अगस्त 1

परिपक्वता जीवन को सहज और सुंदर बनाती है।

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, छोटे अक्षर दिखाई नहीं देते.

शायद यह एक इशारा है कि बढ़ती उम्र के साथ छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीख लेना चाहिए।

फोटो AI जेनरेट
हमें जीवन में छोटी-छोटी बातों को दिल से (हृदय) बिल्कुल नहीं लगना चाहिए हर छोटी गलती पर लोगों से उलझने से मानसिक शांति की कमी हो जाती है जैसे-जैसे अनुभव होता है वैसे-वैसे हमें यह समझ में भी आना चाहिए कि किस बात को हमें तुल देना है और किस बात पर मुस्कुराकर लोगों को नजर अंदाज कर देना है यही परिपक्वता जीवन को सहज और सुंदर बनाने में काफी मददगार होती है।  हालांकि ऐसा हमारे लिए करना थोड़ा मुश्किल जरूर होता है लेकिन प्रयास जरूर किया जा सकता है मैं वर्तमान समय में इन्हीं सभी चीजों से सामना कर रहा हूं और मुझे पता है कि यह करना संभव नहीं है हर किसी के लिए।

मिलते हैं फिर एक नए अनमोल और सकारात्मक विचार के साथ

आपका सवाई सिंह राजपुरोहित


शुक्रवार, जुलाई 31

हमारे जीवन में सुख-दुख तो आते जाते रहेंगे

दुखिया को न सताइए। दुखिया देगा रोए। और जब दुखिया के मुखिया सुने, तब तेरी गति का होए। जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन भगवान के भरोसे सब ठीक हो जाएगा ।

संत कबीर दास जी का यह प्रसिद्ध दोहा इंसानियत, करुणा और कर्म के सिद्धांतों का एक बहुत बड़ा संदेश देता है। हमें जीवन में कभी भी किसी  नहीं सताना चाहिए कोई हमारी वजह से दुखी नहीं होना चाहिए ऐसा होने पर पीड़ित व्यक्ति की आंखों से निकलने वाला आंसू प्रभु तक पहुंचने में बहुत बड़ा योगदान देता है। 

AI जेनरेट

हमारे जीवन में सुख-दुख तो आते जाते रहेंगे आज दुखों का पहाड़ है तो कल सुख सागर भी होगा इसीलिए संकट आने पर घबराएं नहीं धैर्य बनाए रखें ऊपर वाले पर पूरा भरोसा रखिए जीवन में जो भी उतार-चढ़ाव हो रहे हैं वह आपके भले के लिए ही हो रहे हैं कुछ समय के लिए कष्ट जरूर हो रहा होगा लेकिन एक समय आएगा कि हम इन सब चीजों से छुटकारा मिल जाएगा और जीवन पहले से कहीं सुखद हो जाएगा।

अंत में बस एक ही बात बोलूंगा मुश्किल समय में धैर्य रखना चाहिए और उस मालिक पर पूरा भरोसा रखना चाहिए। वही सबकी नैया पार लगाने वाला है।

​जय हो मालिक की! 

​आपके दिन की शुरुआत सकारात्मकता और नई ऊर्जा के साथ हो!

आपका सवाई सिंह राजपुरोहित

गुरुवार, जुलाई 30

शिक्षा और धन के साथ मानवता का महत्व

शिक्षा, सत्य, सराहनीय और वर्तमान समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसमें कोई दो राय नहीं है किताबी ज्ञान, डिग्रियाँ, ऊंचे पद और धन-दौलत इंसान को समाज में सफलता तो दिला सकते हैं, लेकिन एक 'अच्छा और संवेदनशील इंसान' केवल मानवता ही बनाती है।

शिक्षा को महत्व देना और बच्चों में शिक्षा की जिज्ञासा को बढ़ाना बहुत ही आवश्यक है,वो भी वर्तमान समय में जब आप पैसे कमाए और बड़े इंसान बन जाए तो कभी भी ऐसे लाचार मजबूर बेसहारा लोगों को नजरंदाज ना करें यदि आप करने योग्य हो तो ऐसे लोगों का का मदद अवश्य करें जितना आपसे हो सके उनके लिए भी कुछ करने की कोशिश करें क्योंकि शिक्षा, पैसा यह सब जितना जरूरी है उसके साथ ही मानवता भी बहुत जरूरी है और एक बेहतर इंसान बनना बहुत जरूरी है, 

आपके पास कितनी भी शिक्षा हो कितने भी पैसे हो कितने भी आप बड़े अधिकारी पद-प्रतिष्ठित हो यदि आप में मानवता नहीं और किसी के तकलीफ को देखकर आपको तकलीफ नहीं हो रही तो फिर आपका यह सब होना व्यर्थ है इसलिए शिक्षा के साथ-साथ मानवता इंसानियत भी बच्चों में अवश्य भारे, और उन्हें प्रेरणा दें उनका मार्गदर्शन करें क्योंकि जहां तक देखा जा रहा है।

 आज वर्तमान समय में नौजवान युवाओं को बालक - बालिकाओं के अंदर इंसानियत नाम की कोई चीज नहीं रह गई। 

  शिक्षा और धन के साथ मानवता का महत्व

​मानवता का पाठ ही सबसे बड़ी सीख है: - बच्चों को यह समझाना बहुत जरूरी है कि उनका अर्जित किया हुआ ज्ञान और धन केवल उनके अपने परिवार तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के जरूरतमंद और लाचार लोगों के काम भी आए।

​सच्ची सफलता:- डिग्रियाँ और बैंक-बैलेंस तभी सार्थक हैं जब वे किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकें या किसी की मुश्किल को आसान कर सकें। जिस शिक्षा से दूसरों का दर्द महसूस न हो, वह शिक्षा अधूरी है।

​संस्कारों की नींव:- आज की भागदौड़ भरी और भौतिकवादी दुनिया में बच्चों के भीतर करुणा, सहानुभूति (Empathy) और परोपकार की भावना डालना माता-पिता और अभिभावकों का सबसे बड़ा दायित्व है।

यदि हम अपने बच्चों को सफल बनाने के साथ-साथ एक संवेदनशील इंसान भी बना सकें, तो हमारी परवरिश सही मायनों में सफल होगी।

जुड़े रहिए हमारे ब्लॉग के साथ आपका सवाई सिंह राजपुरोहित


मंगलवार, जुलाई 21

शब्दों का मुखौटा और इरादों का सच

आजकल लोगों को पहचानना बहुत ही मुश्किल हो गया है आए दिन हमारे जीवन में ऐसी घटनाओं का हमें सामना करना ही पड़ता है इसके बाद हमें पछतावा होता है कि हम ऐसे लोगों के साथ जुड़े ही क्यों थे। 

 लोगों के शब्दों पर नहीं, उनके इरादों पर गौर किया करो

क्योंकि कोई डांटकर भी आपका अच्छा चाहता है,

तो कोई हंसकर भी जड़ें काट देता है। 

कई बार लोग मीठी वाणी या मुस्कान के पीछे अपने स्वार्थ और बुरे इरादों को छुपा लेते हैं, जिससे पहचानना मुश्किल हो जाता है।

​इसके विपरीत, कुछ लोग स्वभाव से सख्त या सीधे होते हैं जो डांटकर या सच बोलकर आपका मार्गदर्शन करते हैं और आपकी भलाई सोचते हैं।

मिलते हैं किसी और अनमोल विचार के साथ तब तक के लिए आपका सवाई सिंह

शुक्रवार, फ़रवरी 20

खुश नशीब हो अगर माँ बाप जिंदा है.।

 सच्ची परवाह सिर्फ माँ बाप करते है। 
बाकी दुनिया तो मतलब के लिए दिखावा करती है।
 खुश नशीब हो अगर माँ बाप जिंदा है.।




गुरुवार, फ़रवरी 19

भगवान की इच्छा से हो रहा है।

“जो कुछ हो रहा है, वह भगवान की कृपा से और भगवान की इच्छा से हो रहा है।”

इस भाव से चिंता दूर होती है और विश्वास दृढ़ होता है।

भगवान की इच्छा से हो रहा है।”



बुधवार, फ़रवरी 18

मेरे निःस्वार्थ समर्पण के बाद भी...

 हे प्रभू! 

मेरे निःस्वार्थ समर्पण के बाद भी जिन्होंने मुझमें सिर्फ कमियाँ ही निकाली उन्हें मैं अनंत काल तक किसी जन्म में ना मिलूं !

****


गुरुवार, नवंबर 13

Vahi sacche Mitra Hai Baki Sab Moh Maya Hai

 जेल के गेट पर, हॉस्पिटल के बेड पर और मुकदमे पर पेशी में साथ मिलते है वो ही मित्र है बाक़ी सब मोहमाया है!



बुधवार, नवंबर 12

Ladkon ko Paisa hi Sab Kuchh Dila sakta hai

 लड़कों को पैसा ही सब कुछ दिला सकता है,
 इज़्ज़त प्यार सुंदरता और अपनी बात रखने का हक!

जब किसी की संगत से आपके विचार शुद्ध होने लगे तो समझ लीजिए कि वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है..!

SM series 4 by Sawai Singh 


मंगलवार, नवंबर 11

Dhokha Dene Wale sochte Hai...

 धोखा देने वाले सोचते हैं कि उन्होंने चालाकी की 
पर असल में उन्होंने खुद के लिए 
भरोसे का दरवाजा बंद कर लिया ।



मंगलवार, अक्टूबर 7

Har samasya ka toll free number hai pitaji

 परिस्थितियां जितनी ज्यादा आपको तोड़ती है, 

उससे कहीं ज्यादा आपको मजबूत बना देती है...!!



सोमवार, अक्टूबर 6

अगर आपकी जाति की जनसंख्या कम हैं।

अगर आपकी जाति की जनसंख्या कम हैं।

 तो उदास मत होना और अधिक हैं तो उत्साहित मत होना, जाती की हकीकत सिर्फ इतनी हैं,

अगर आप अपनी जाति के सफल व्यक्ति हैं तो आपकी जाति आपके पीछे खड़ी हैं और अगर असफल व्यक्ति हैं तो आप अपनी ही जाति में सबसे पीछे खड़े हैं, 

फिर आपको कोई पूछने वाला नहीं हैं.



मंगलवार, जुलाई 8

सही समय पर सही निर्णय लेना भी आवश्यक है।

जीवन में सब कुछ अनुभव करना ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेना भी आवश्यक है। रास्ते पर कंकड़ ही कंकड़ हो तो भी, एक अच्छा जूता पहनकर उस पर चला जा सकता है, लेकिन यदि एक अच्छे जूते के अंदर एक भी कंकड़ हो तो, एक अच्छी सड़क पर भी कुछ कदम चलना मुश्किल है।

बाहर की चुनोतियों सें नहीं हम अपनी अंदर की कमजोरियों से हारते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह परिस्थितियों से लड़े, एक स्वप्न टूटे, तो दूसरा गढ़े। जो मज़ा भाग लेने में है वो मज़ा भाग जाने में कहाँ।

अपने सपनों को पूरा करने के लिए की जान लगे

शुक्रवार, जून 27

हमारे बचपन का भी एक जमाना था यारो और आज ?

खुद ही स्कूल पैदल जाना होता था क्योंकि साइकिल ,बस आदि से बच्चे को स्कूल भेजने का रिवाज ही नहीं था, स्कूल भेजने के बाद कुछ अच्छा बुरा होगा ऐसा हमारे मां-बाप कभी सोचते भी नहीं थे । उस समय किसी बात का डर भी नहीं था, और पूरे गांव के लोग को ये जानते थे कि बच्चा किस का पोता या पुत्र है । खोने का डर था नहीं ।

फर्स्ट, सेकंड ,थर्ड डिवीजन पास या फेल यही हमको मालूम था । पर्सेंटेज % से हमारा कभी भी संबंध नहीं रहा ।

ट्यूशन लगाई है ऐसा बताने में भी शर्म आती थी क्योंकि हमको बुद्धि से पैदल समझा जा सकता था ।

किताबों में पीपल के पत्ते, विद्या के पत्ते, मोर पंख रखकर हम होशियार हो सकते हैं ऐसी हमारी धारणाएं थी...

कपड़े की थैली में...बस्तों में और बाद में एल्यूमीनियम की पेटियों में किताब कॉपियां बेहतरीन तरीके से जमा कर रखने में हमें महारत हासिल थी।

हर साल जब नई क्लास का बस्ता जमाते थे उसके पहले किताब कापी के ऊपर पेपर की जिल्द चढ़ाते थे और यह काम एक वार्षिक उत्सव या त्योहार की तरह होता था ।

साल खत्म होने के बाद किताबें बेचना और अगले साल की पुरानी किताबें खरीदने में हमें किसी प्रकार की शर्म नहीं होती थी.*क्योंकि तब हर साल न किताब बदलती थी और न ही पाठ्यक्रम ।

 हमारे माता पिता को ऐसा कभी लगा ही नहीं कि हमारी पढ़ाई बोझ है..

  किसी एक दोस्त को साइकिल के अगले डंडे पर और दूसरे दोस्त को पीछे कैरियर पर बिठाकर गली-गली में घूमना हमारी दिनचर्या थी ।*इस तरह हम ना जाने कितना घंटे किलोमीटर घूमे होंगे पता नहीं और किसी को परवाह भी नहीं , सिर्फ चोट लगने खून बहने पर ही मां के पास आना गाली डांट सुनना और कपड़े की पानी में भीगी पट्टी या और कोई इलाज करा कर डरते डरते फिर दोस्तों के साथ खेलने भाग जाना ।

 स्कूल में मास्टर जी के हाथ से मार खाना, पैर के अंगूठे पकड़ कर खड़े रहना, और कान लाल होने तक मरोड़े जाते वक्त हमारा आत्म सम्मान कभी आड़े नहीं आता था । सही बताएं तो आत्मसम्मान क्या होता है यह हमें और किसी को भी मालूम ही नहीं था ।

घर और स्कूल में मार खाना भी हमारे दैनिक जीवन की एक सामान्य प्रक्रिया थी ।

मारने वाला और मार खाने वाला दोनों ही खुश रहते थे...

मार खाने वाला इसलिए क्योंकि कल से आज कम पिटे हैं और मारने वाला इसलिए कि आज फिर हाथ धो लिए ।

 बिना चप्पल जूते के और किसी भी गेंद के साथ लकड़ी के कपड़े धोने वाले पट्टे से कही पर भी नंगे पैर क्रिकेट खेलने में क्या सुख था वह हमको ही पता है...

 हमने जेब खर्च कभी भी मांगा ही नहीं और पिताजी ने कभी दिया भी नहीं..

इसलिए हमारी आवश्यकता भी छोटी छोटी सी ही थीं....साल में कभी-कभार दो चार बार सेव मिक्सचर मुरमुरे का भेल, गोली टॉफी , इमली, डाँसरे, खट्टा मीठा चूर्ण खा लिया तो बहुत होता था, उसमें भी हम बहुत खुश हो जाते ।...

छोटी मोटी जरूरतें तो घर में ही कोई भी पूरी कर देता था क्योंकि परिवार संयुक्त होते थे।जैसे ताऊ ताई ,चाचा चाची काका काकी, दादा दादी , बुआ आदि ..

 दिवाली में लगी पटाखों की लड़ी को छुट्टा करके एक एक पटाखा फोड़ते रहने में हमको कभी अपमान नहीं लगा.

 अपने मां बाप को कभी बता ही नहीं पाए कि हम आपको कितना प्रेम करते हैं क्योंकि हमको आई लव यू कहना भी नहीं आता था और भाई लट्ठ डंडे का जमाना था पीटने का भी डर था ।

  स्कूल की डबल ट्रिपल सीट पर घूमने वाले हम और स्कूल के बाहर उस हाफ पेंट में रहकर गोली टाॅफी बेचने वाले की दुकान पर दोस्तों द्वारा खिलाए पिलाए जाने की कृपा हमें याद है । वह दोस्त कहां खो गए , वह बेर वाली कहां खो गई।वह चूरन बेचने वाली कहां खो गई...पता नहीं.. 

कपड़ों की सलवटें को प्रेस , आयरन , से नहीं मिटते थे बल्कि रात को सोते समय अपने तकिया या अपनी कमरके नीचे रखना ही काफी था । रिश्तों में कोई औपचारिकता नहीं थी।.

सुबह का खाना और रात का खाना इसके सिवा टिफिन में अखबार में लपेट कर रोटी ले जाने का सुख क्या है, आजकल के बच्चों को पता ही नही ...

 हमारा भी एक बचपन और लड़कपन का जमाना था जनाब ।

👉 एक बात तो तय मानिए कि जो भी पूरा पढ़ेगा उसे अपने बीते जीवन के पुराने सुहाने पल अवश्य याद आयेंगे 

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रविवार, जून 15

"पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः।

 "पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः  पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्व देवता"

पिताजी के वो डांट फटकार ओर शब्द .. जो बचपन में सिर्फ "खराब शब्द" लगे थे, पर आज "सबक" बन गए हैं! आईए जानते हैं कुछ वाक्य जो आपने जरूर सुने होंगे

1. "पढ़ाई पर ध्यान दो, बाकी सब बाद में!"

2. "मैं जो कर रहा हूं, सब तुम्हारे लिए कर रहा हूं।"

3. "खुद के पैरों पर खड़ा होना सीख।"

4. " अनपढ़ जैसे मत बन, मुझसे अच्छा बन।"

5. "बड़ा आदमी बन, लेकिन अच्छा इंसान पहले बन।"

6. "नाम रोशन करना, बस यही सपना है मेरा।"

7. "तेरी उम्र में मैं जिम्मेदारियां उठाता था।"

8. "खर्च सोच-समझकर करना, पैसे पेड़ पर नहीं उगते।"

9. "मां को कभी दुख मत देना, नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"

10. "बचपन जल्दी निकल जाएगा, सम्हल जा।"

11. "कमाना आसान है, इज्जत कमाना मुश्किल।"

12. "अपने फैसले खुद ले, लेकिन सोच समझकर।"

13. "दोस्ती सोच समझकर करना, सब तेरे जैसे नहीं होते।"

14. "हर वक्त तेरे पीछे नहीं रहूंगा, खुद लड़ना सीख।"

15. "जो भी कर, मेरा सिर ऊँचा होना चाहिए!"

16. "मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा, तू खुश रहे बस।"

17. "जो सीख रहा है, ज़िंदगी में काम आएगा।"

18. "ज़िंदगी में गिरा भी तो उठना सीख।"

19. "तेरे लिए ही तो सब कुछ कर रहा हूं बेटा।"

20. "जिस दिन खुद के लिए खड़ा होगा, उसी दिन मेरा सपना पूरा होगा।"

21. "तू बस मेहनत कर, किस्मत मैं संभाल लूंगा।"

22. "कभी भी झूठ मत बोलना, चाहे हालात कैसे भी हों।"

23. "तू मेरा बेटा है, खुद पर भरोसा रख।"

24. "बेटा कितना भी बड़ा हो जाए, बाप हमेशा बाप ही रहेगा।"

25. "जब मैं नहीं रहूंगा, तब समझेगा कि मैं क्या था।"

आज जब ये शब्द याद आते हैं, तो लगता है…तब समझ नहीं आता था, पर आज ये हर वाक्य ज़िंदगी की नींव जैसा लगता है

अगर आपके पिताजी ने भी कभी इनमें से कुछ कहा हो…तो दिल से एक कमेंट जरूर करना ओर पोस्ट शेयर करना।           

आप सभी को "पितृ दिवस" की हार्दिक बधाई !

पिता जी के असीम त्याग और उठाए गए अनंत कष्टों के प्रति हृदयपूर्वक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ... सवाई सिंह राजपुरोहित 

बुधवार, अक्टूबर 23

माता पिता की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म होता है.

अगर हर लड़की अपने सास को अपनी माँ समझें और हर सास अपनी बहू को बेटी समझे तो परिवार मैं कभी कोई लड़ाई झगड़े नही होंगे और हमें अपने माता पिता का आदर हमेशा करना चाहिये। 

 सभी बहू और सांसों को समझना चाहिए आपस में मिल जुल कर रहना चाहिए एक दूसरे की मदद करनी चाहिए मदद करने से ही भगवान घर में विराजमान रहते हैं और सभी दुखों का निवारण भी हो जाता है कष्ट मिट जाते हैं ऐसा नहीं कि सास को बहू गाली दे से बाहर निकाले घर से पहले सबसे पहले खाना सास को ही देना चाहिए क्योंकि अपने पति को उसी ने जन्म देकर के पाला पोसा करके अपने हवाले करते हैं तो उसका यह अदा यह नहीं कि उसका अनादर करें माता पिता ही भगवान होते हैं और माता पिता की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म होता है और कर्म जैसे कर्म करोगे वैसा ही तो आपको फल मिलेगा माता पिता से बड़ा और कोई धरती पर धरती पर नहीं है। 

इसलिए मैं आप सभी से निवेदन करना चाहूंगा कि आप सभी अपने माता-पिता और सास ससुर की सेवा अवश्य करें क्योंकि माता-पिता की सेवा करने से भगवान भी प्रसन्न होते हैं 

मंगलवार, अक्टूबर 22

हम जितना सोचते हैं, उतना अगर काम करने लग जाए तो ...

 आज का सुविचार

आज के टाइम में सब लोग सपने बहुत देखते हैं लेकिन उन सपनों को प्राप्त करने के लिए कार्य कोई नहीं करना चाहता हालांकि सपने देखना कोई बुरी बात नहीं है क्योंकि सपने देखेंगे तभी हम उन्हें पूरा करने की कोशिश करेंगे लेकिन कुछ लोग सपने देखे तो हैं लेकिन प्राप्त करने के लिए कोई प्रयास नहीं करते चाहे उन्हें कोई कितनी बार भी समझ ले जो आपके अपने होंगे वह आपको एक - दो बार तो जरुर समझाएंगे फिर उनको भी लगने लगेगा कि शायद आप कुछ करना नहीं चाहते तो वह भी थक हार कर यह प्रयास करना छोड़ देते हैं।

  सोचना इस दुनिया का सबसे फालतू काम है, क्योंकि यह बैठे -ठाले ही हमें दु:खी उदास अकर्मण्य बना जाता है! जब भी आप देखें कि आप कुछ सोचने जा रहे हैं, कोई काम करने लग जाए ! जो काम आप करेंगे उसमें सफलता जरूर मिलेगी याद रखें कि कर्म ही धर्म है! अपने धर्म का पालन करें, सोचने से बचे और कर्मठ बने ! आनंद और सफलताएं आप पर चारों दिशाओं से बरसने लगेगी। 

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